नियम का महत्व
एक बार की बात है, एक संत मोती सेठ के घर आए। प्रवचन हुआ। विषय था- नियम पालन।
प्रवचन देने के बाद, संत बोले- मोती तुम भी कोई नियम ले लो।
मोती ने कहा- आप जैसा कहें महाराज!
संत बोले- इक्यावन माला प्रतिदिन।
मोती- इक्यावन तो बहुत अधिक हैं। इतना समय कहाँ है महाराज?
संत बोले- इक्कीस माला प्रतिदिन।
मोती- इक्कीस भी अधिक हैं महाराज! किसी दिन न कर पाया तो पाप का भागी बनूंगा।
संत ने पूछा- ग्यारह माला?
मोती- ग्यारह तो ठीक है, पर महाराज मेरा बाहर देश में भी आना जाना रहता है। मालूम नहीं कि निभा पाऊँगा या नहीं?
संत समझ गए कि सेठ जी माला जपना ही नहीं चाहते। तो बोले- तब जो नियम आप लेना चाहें अपनी मर्जी से ले लें। पर कोई नियम तो लें।
मोती ने बहुत देर तक विचार किया, फिर बोला- महाराज! रोज सुबह जब तक मैं रामू कुम्हार का चेहरा नहीं देख लूंगा, मुँह में एक अन्न का दाना नहीं डालूंगा।
संत का मन तो किया कि अपना माथा पीट लें, पर सोचा कि जैसी भगवान की इच्छा। तो मोती को संकल्प दिलवा कर, अपने स्थान को चले गए।
अब रामू तो मोती के घर के सामने ही रहता था। और सुबह सवेरे ही अपने चाक पर बर्तन बनाने का उसका भी अघोषित नियम ही था। मोती को क्या परेशानी होती? रोज सुबह मोती जितने बजे भी जागता, बिस्तर से उठते ही सबसे पहले अपनी खिड़की पर आता और रामू का चेहरा देख लेता। बस, नियम पूरा हुआ, अब जो मर्जी आए करो। ऐसे मोती को बयालीस दिन पूरे हो गए।
तिरतालिसवें दिन सुबह मोती जागा, उठा, खिड़की पर आया, पर यह क्या? रामू का आँगन सूना? मोती घबरा गया। तुरंत नीचे आकर आवाज लगाई- रामू! ओ रामू!
रामू तो नहीं आया, रामू की पत्नी आई। बोली- सेठ जी! ये तो जंगल से मिट्टी लाने गए हैं। थोड़ी देर में आ जाएँगे।
पर मोती के पेट में तो चूहे कूद रहे थे, रामू के आने की प्रतीक्षा कौन करे? "नियम तोड़ना ठीक नहीं।" ऐसा विचार कर मोती ने अपनी सायकिल उठाई और जंगल की ओर दौड़ा।
संयोग से इधर मोती चला और उधर रामू को मिट्टी खोदते हुए सोने से भरा एक ताँबे का मटका मिला। मोती पहुँचा तो रामू ने पीछे देखा। दोनों की दृष्टि मिली। मोती ने रामू का चेहरा देखा और ताली बजा कर बोला- देख लिया! देख लिया!
रामू को लगा कि सेठ जी ने सोने से भरा मटका देख लिया। अब रामू घबरा गया और बोला- सेठ जी! किसी और को मत बताना। हम सोना आधा आधा बाँट लेंगे।
मोती सोचने लगा कि मैंने तो अपनी मर्जी से ऐसे ही नियम ले लिया था, तब इतना लाभ हो रहा है, यदि जो संत दे रहे थे वह नियम ले लेता तो मालूम नहीं क्या मिल जाता?
इसीलिए स्वामी सियाराम बाबा कहते है कि और अधिक कर सको तो बहुत अच्छा, पर अधिक न होता हो तो भी नियम का पालन तो करो ही।
यह कहानी हमारे संत हमें सही दिशा हेतु सुनाते रहे हैं। पर क्या आपने वाकई में गहराई से सोचा है? नियम हमें गतिमान रखते। गति ही जीवन है। साथ ही नियम हमें अनुशासन में रखते हैं ।जब हम अनुशासन में रहने लगते है तब धिरे धिरे हमारा मन नियंत्रण में आने लगता है। जहां मन नियंत्रण में आ जाएं तो आपके अन्दर स्थित खजाना आप पा लोगे। जीवन को गतिमान बनाए रखने हेतु तथा मन के नियंत्रण हेतु किसी भी सात्विक नियम का अनुपालन कर जीवन के ध्येय को पाना ही इस कहानी का मर्म है।

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