निर्णय की प्रासंगिकता
निर्णय की प्रासंगिकता
जीवन में निर्णय की अहम भूमिका होती है। बचपन से गलत निर्णय हमें मजाक बनाने या डांट खाने को तो सही निर्णय हमें शाबाशी देता है। ये चिजे सदैव सही रहने के लिए संवेदनशील बना देती है। यह जरूरी तो नहीं कि हम हर समय सही रहे।सही बने रहने की आदत हमें संकीर्ण बना सकती है। नए प्रयोग तथा नया सोचना हम बंद कर देते हैं । यहीं से आपकी सृजनशीलता समाप्त होने लगती है।
सही बनना केवल परिस्थितियों के हिसाब से तय किया जा सकता है। उदाहरण के लिए अंधेरे में एक रस्सी पड़ी है। आप डर जाते है। भय से उसे मारने का निर्णय या दूर जाने का या अन्य व्यक्तियों को आगाह करने का निर्णय लेते हैं ।यहां पर परिस्थिति अंधेरा थी। जिसके परिणाम स्वरूप आपको वह वस्तु का ज्ञान नहीं हुआ। उजाले में या उचित रोशनी मेंआप जान पाते हैं,कि वह एक रस्सी है। पुनः आप निर्णय लेते हैं कि डरने की कोई जरूरत नहीं है।
अब निर्णय को प्रभावित किसने किया१) परिस्थितियों ने २) आपके मस्तिष्क ने
परिस्थितियां पर्यावरण तथा आपके भाग्य से उत्पन्न होती है ।भाग्य ने यह निर्धारित कर दिया कि आप भारत में ,दिल्ली प्रदेश में, एक मिडिल क्लास या हाई क्लास परिवार में उत्पन्न होंगे। परिणाम स्वरूप आपकी सोच तथा विचारों पर इस परिवार तथा इससे संबंधित गतिविधियों का असर पड़ेगा ।दूसरा दिल्ली में व्याप्त समस्त रिती रिवाज संस्कारों का प्रभाव पड़ेगा उसके हिसाब से आप के निर्णय प्रभावित होंगे।
विवेक(मस्तिष्क) आप में सत्य चुनने की क्षमता द्वारा निर्धारित होता है। सत्य क्या है? शास्त्र कहते हैं जो नष्ट ना हो। वह तो केवल ईश्वर या परम चेतना ही हो सकती है। जो स्रष्टी को बनाए रखने के लिए जरूरी है ऐसी गतिविधियां सत्य के करीब है।प्राकृतिक आपदा दैवीय प्रकोप जिसे हम नहीं बदल सकते। परंतु उसके बाद पुनः सृष्टि को बनाए रखने के लिए किसी भी एसे कार्य को करना व्यवहारिक सत्य को इंगित करता हैं। ऐसे निर्णय विवेकशीलता को इंगित करता है। अर्थात ऐसे निर्णय जिससे किसी अन्य की हानि ना हो ऐसे निर्णय आपकी कार्यक्षमता ,संतोष ,स्रजन करने की क्षमता के साथ आपके व्यक्तित्व को भी नया आयाम प्रदान करते हैं।
कभी-कभी प्रारब्ध या भाग्य या परिस्थितियों का फोर्स इतना अधिक होता है कि आप ना चाहते हुए भी निर्णय ले लेते हैं। कार्य को करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। जिसके परिणाम भी नियति तय करती है।
कुछ कार्यों से दुख होता है।नियति द्वारा तय पीड़ा ओ तथा अन्य कई प्रकार कि विभत्स परिस्थितियों से सभी व्यक्ति गुजरते हैं। परंतु एक व्यक्ति इस संघर्ष से सफलता की चरमता को हासिल करता है तो दूसरा अवसाद ग्रस्त या असफल जीवन जीता है ।बार-बार दुखों को सोचते रहने से आपके अंदर चीर स्थाई दृष्टिकोण उपस्थित हो जाता है जो चीजों के देखने के दृष्टिकोण को ही बदल देता है।यह स्थिति कल्पना पर आधारित मानसिकता को इंगित करती है। वहीं संवेदना का पहाड़ स्वयं को उस स्थिति से जोड़े रखता है। आपके निर्णय समझदारी भरे ना होकर मजबूरी भरे हो जाते हैं। पुन: आपके जीवन को रोमांचकारी बनाने की बजाय उबाऊ तथा बोरियत बना देते हैं।
व्यक्ति में पांच प्रकार की मानसिक स्थितियां होती हैं। जो उसकी प्रकृति के कारण उत्पन्न होती है। हम यहां विश्लेषण करते हैं ।जो उसके निर्णय को बहुत अधिक प्रभावित करती है। पांच अवस्थाएं इस प्रकार से है-१) भावुकता २) संवेदनशीलता ३) कल्पना ४) वास्तविकता ५) चैतन्यता
१) भावुकता-यह ऐसी मानसिक अवस्था है जहां आप तर्कशील नहीं रह पाते जो आपके के निर्णय क्षमता को प्रभावित करते हैं ।यह आसक्ति देती है। आप के निर्णय तर्क पर आधारित न होकर आसक्ती पर आधारित हो जाते हैं ।आपका मस्तिष्क यह जानता है कि वह व्यक्ति या स्थिति गलत है। परंतु भावुक होकर उस परिस्थिति से घनिष्ठता से जुड़कर निर्णय लेते हैं और निर्णय गलत हो जाते हैं।
इसके विपरीत घृणा की स्थिति भी समान होती है। आपको कार्य विशेष करना चाहिए पर उसके प्रति आपकी घृणा उसे करने से रोकती है ।यहां भी निर्णय आप गलत ले लेते हैं।
२) संवेदनशीलता-यह मस्तिष्क की ऐसी अवस्था है जहां आप आसक्त तो नहीं होते परंतु यह आपने करुणा या पीड़ा उत्पन्न कर देती है ।यह भी आपकी तार्किकता को समाप्त करती है।क्योंकि किसी की पीड़ा को समझने या महसूस करने के लिए संवेदना आवश्यक है। परंतु निर्णय लेते समय संवेदनाओ के प्रति झुकाव आप को कमजोर कर देता है और निर्णय गलत हो जाते हैैं।
३) कल्पना-यह मस्तिसक की ऐसी अवस्था है। जहांआप वर्तमान से दूर रहते हैं अर्थात वास्तविक परिस्थितियों से अनभिज्ञ होते हैं। अनुमान पर निर्णय लेने की यह प्रक्रिया भी गलत हो जाती हैं।
४) वास्तविकता-यह मस्तिष्क की ऐसी अवस्था है जो स्वयं को स्विकारती है ।यह वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित होती है। यह आपके अंदर उपस्थित क्षमताओं का आकलन वास्तविकता के आधार पर करती है। ऐसी अवस्था में लिए गए निर्णयो के सही होने की संभावना अधिक होती है।
५) चैतन्यता-यह पूर्ण प्रज्ञा की अवस्था है। यहां सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, नैतिकता-अनैतिकता का उसे पूर्ण ज्ञान होता है।तब उसे न आसक्ती होती है न परिस्थिति विशेष से मोह जो निर्णय की सबसे उत्तम अवस्था है।
ये समस्त अवस्थाएं प्रत्येक व्यक्ति में मौजूद होती है ।एक ज्योतिष ग्रहों तथा दशा के आकलन से बता सकता है कि कब उसकी चुनाव या निर्णय सफलता के लिए उचित हो सकते हैं ।मनोभाव का आना और जाना ईश्वरी देने हैं हम तो केवल निमित्त हैं उन्हें अनुभव करने के एक ज्योतिष एक मनोवैज्ञानिक से अधिक सटीक तरीके से बता सकता है कि आप मस्तिष्क की किस अवस्था में हैं।
इस प्रकार निर्णय लेते समय संतुलित मानसिकता आवश्यक है।

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