संतोष आनंद की ओर ले जाता है
संतोष आनंद की ओर ले जाता है
हमारे अंदर किसी भी कार्य को करने के बाद एक भाव उत्पन्न होता है जो:
१)सुख का भाव हो सकता है।
२) दुख या फ़िर पीड़ाजन्य हो सकता है।
३) संतोष का हो सकता है ।
सुख का भाव तुरन्त तो सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करता है परंतु सुख भोगने की चाह को बनाए रखता है । लालसा यहां मरती नहीं है । यहां पर भी दो प्रतिक्रियाएं हो सकती है-
१) अपने सुख मिलने की चाह को ज्यादा महत्व नहीं देना।
२)उस सुख की चाह को न मिलने पर आप में गुस्सा,क्रोध, अवसाद, चिंता उत्पन्न कर देना।आप उसे पाने के लिए प्रयास प्रारंभ करेंगे ।प्रयास इतना हो जाएगा कि वह आपकी आदत बन जाएगा।इस प्रकार यह सुख का भाव भी आपको पूर्ण रूप से अपने नियंत्रण में ले आया है। यहां पर भी आपकी विवेक की हानी हो गई ।भ्रम में ओर उलझ गए।
दुख का भाव पीड़ा या दुख भोगना किसी भी प्राणी को अच्छा या प्रिय नहीं लगता परंतु उस पीड़ा को भोग कर भूल जाना तुरंत आपको एक उत्तम स्थिति की ओर ले जाता है ।आप इसे इस कहानी के माध्यम से समझ सकते हो-एक बार भगवान बुद्ध को एक व्यक्ति ने गुस्से में गालियां दी। परंतु बुद्ध ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी ।पुनः उस व्यक्ति ने बुद्ध के ऊपर थूका इस पर भगवान बुद्ध ने उस थुक को पोंछ कर अपने शिष्यो से वार्तालाप में व्यस्त हो गए। इस पर उनके एक शिष्य को अत्यधिक गुस्सा आया। वह उस व्यक्ति को सबक सिखाने के उद्देश्य से आगे बढ़ने ही वाला था, कि महात्मा बुद्ध ने उसे रोक दिया।क्रोध तथा गुस्सा करना, ये उसके कार्य है। उनके परिणाम स्वरूप हम पर पीड़ा आई ।यदि हम इस पीड़ा को स्थाई ले लेंगे तो पुनः: इसकी एक प्रतिक्रिया होगी ।प्रतिक्रिया स्वरूप हम कर्म करेंगे जिसके परिणाम हमें पुनः भुगतने होंगे।एक सिलसिला प्रारंभ हो जाएगा।अतः ऐसे कार्यों को भूल जाना ही श्रेयस्कर होता है।
इस प्रकार पीड़ा को बार-बार स्मृति पटल पर लाना भी उसके प्रति भाव या पीड़ा को बनाए रखने जैसा है ।यै भाव स्थाई स्वरूप ले लेते हैं । इससे कई अन्य भ्रांतियां उत्पन्न होती है ।दुख सहा है तो दो बातें हो सकती है-पहली आप चाहोगे कि अन्य व्यक्ति भी इस पीड़ा को सहन करें, अतः आप में बदले की, ईर्ष्या या द्वेष की भावना उत्पन्न होगी। दूसरी बात बार-बार लाने से दुखी रहने की आदत बन जाएगी। आप दुख के क्षणों को भी भूल नहीं पाएंगे । श्रीमद्भागवत गीता में नर्क के तीन द्वार कहे हैं - काम ,क्रोध ,लोभ । काम,क्रोध तथा लोभ किसी भी सीमा तक क्यों ना हो उसके परिणाम दुखद तथा पीडा़ जन्य ही होते हैं ।
संतोष का भाव सकारात्मक तथा संतुलित भाव होता है,जो आपके अंदर पाने की लालसा या खोने की तड़प से परे संतुष्टि उत्पन्न करता है।
ज्यादातर यह भाव किसी की मदद करने या सेवा करने से उत्पन्न होता है। इससे उत्पन्न ऊर्जा ही आपकी नकारात्मक ऊर्जा को नियंत्रित कर सकती है।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जब आप खुश होते हैं तो डोपामाईन हार्मोन निकलता है जो किसी चीज की तीव्र इच्छा तो पैदा करता है,पर संतुष्टि नहीं देता। जबकि दूसरों के लिए सोचने पर आक्सिटोसिन हार्मोन निकलता है।यह नि:स्वार्थी, दयालु और प्रेमपूर्ण बनाता है।
संतोष का भाव ही आनंद की ओर ले जाता हैं।
"सुख के प्रति राग तथा
दुख के प्रति द्वेष
ना आने देना ही
संतुलन है ।"
आप इस सिद्धांत के जितने करीब होंगे उतनी अधिक व्यावहारिक तथा सुखी जीवन जी पाएंगे।यही आनंद पाने का रहस्य भी है।

Wowww Amazing ✨
ReplyDeleteThank you ❤️
DeleteNice article 👍
ReplyDeleteThank you 😊❤️
DeleteBeautiful
ReplyDelete