स्वयं ख़जाना हो
स्वयं खजाना हो-
व्यक्ति जीवन भर भटकता रहता है। हाथ पैर मारता है ,दूसरों से उम्मीद करता है,कि वे उसकी मदद करें। कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाए जो उसे आगे बढ़ाए। यह संसार क्रिया प्रतिक्रिया के नियम में काम करता है ,जब तक आपकी मांगने दूसरों से उम्मीदों की आदतें बनी रहेगी प्रतिक्रिया भी इसी अनुरूप मिलेगी। सभी आपसे मांगने वाले आप से उम्मीद करने वाले ही आपको मिलते रहेंगे और आपका जीवन सदैव असंतोष से घिरा रहेगा। जैसे ही आप दाता की भूमिका में आते हैं। आपको अनजान लोगों से मदद मिलनी शुरू हो जाती है ।यह जीवन का नियम है।
इसी तथ्य को हम प्राचीन कहानी के माध्यम से समझते हैं। एक जगह एक भिखारी सड़क के किनारे बैठकर बीच -पच्चीस वर्षों तक भीख मांगता रहा। फिर मौत आ गई और मर गया। जीवन भर उसकी यही कामना रही कि मैं भी सम्राट हो जाऊं। लेकिन हाथ फैलाकर एक-एक पैसा मांगकर कभी कोई सम्राट हुआ है? मांगने की आदत जितनी बढ़ती है आदमी उतना ही बड़ा भिखारी हो जाता है ।लेकिन इतना जरूर हुआ कि पच्चिस वर्ष पहले वह छोटा भिखारी था। पुलिस वर्ष बाद पूरे नगर में प्रसिद्ध भिखारी हो गया था। गांव के लोगों ने उसका अंतिम संस्कार करवा दिया। गांव वालों ने वह जगह है ।साफ कराने की सोची । भीखारी के गंदे कपड़े ,उसकी टूटी झोपड़ी ,बर्तन -भांडे सब सामान फिकवा दिया। खोद-खोद कर वहां की जमीन समतल करने लगे। लेकिन जब मिट्टी खोदी तो सब हैरान रह गए । भीड़ जुटने लगी। भिखारी जिस जगह पर बैठा था ।वहां बड़ा खजाना गड़ा था ।वह सम्राट हो सकता था, लेकिन वह लोगों की तरफ हाथ पसारे रहा ,जो खुद भिखारी थे। गांव के लोग आपस में बातचीत करते रहे कर रहे थे बड़ा अभागा था।
एक संत गुजरे उन्होंने हंसकर कहा कि उस अभागे की फ़िक्र छोड़ो ।दोड़ों अपनी् घर अपनी जमीन को खोजो, कहीं वहां खजाना तो नहीं।
संत बोले खजाना वही होता है, जहां आप स्वयं होते हैं।स्वयं को जाने बिना दुसरे से मदद की भीख मांगते रहते हैं।
प्रेम के बड़े खजाने हैं, हमारे भीतर। काबिलियत का भंडार है, बस हम स्वयं पर विश्वास ही नहीं करते, बाहर की दुनिया में इन्हें टटोलते रहते हैं।इनकी भीख मांगते हैं।वह भी उन व्यक्तियों से जो स्वयं ही भिखारी हैं।
स्वयं पर भरोसा ,विश्वास, संतोष,दाता बनना, परोपकारी बनाना आदि ऐसी चिजे है जो आपका खजाना है और ये चिजे मूलरुप से हर व्यक्ति विद्यमान होती है। बस इसे हम जानने का समझने का प्रयास ही नहीं करते है। यही से स्वयं की पहचान की क्रियाएं समाप्त होने लगती है।

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