ऊर्जा विचारों की हो या कार्य की सन्तुलन ज़रुरी है

 उर्जा विचारों की हो या कार्य की सन्तुलन जरुरी है



     समस्त वस्तुएं द्रव्य (मेटर) है जिन की तीन अवस्थाएं ठोस ,द्रव, गैस होती है। प्राचीन भारतीय दर्शन पंचमहाभूतों से समस्त तत्वों के निर्माण के बाद कहता है। ये तत्व -आकाश,अग्नि, वायु ,जल और पृथ्वी तत्व है।।इन्हीं की कम या ज्यादा मात्रा वस्तु के आकार स्वरूप स्वभाव में भिन्नता प्रदान करती है। यह पंचमहाभूत ही संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त होकर समस्त प्राणी जगत में व्याप्त है।

              आधुनिक भौतिक विज्ञान ने यह भी सिद्ध किया की समस्त पदार्थों में स्थित ऊर्जा खत्म नहीं होती वरन किसी दूसरे रूप में परिवर्तित हो जाती है। ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। भारतीय दर्शन भी शरीर के अंदर स्थित आत्मा को ऊर्जा मानता है , जिसका छय नहीं है। शरीर से ऊर्जा/ आत्मा के निकलने के बाद शरीर निष्क्रिय होकर नष्ट हो जाता है। यहां पर भी ऊर्जा का स्वरूप बदलता है।

       विज्ञान यह भी मानता है कि प्रत्येक कार्य की अपनी एक ऊर्जा है ।यह ऊर्जा कभी खत्म नहीं हो सकती। कार्य को भौतिक विज्ञान इस प्रकार परिभाषित करता है -'किसी वस्तु या मैटर पर आप बल लगाते हैं तो वस्तु बल की दिशा में विस्थापित होती है।'

               W=F×d.  

 W=कार्य,F=बल,d=दुरी

विज्ञान के अनुसार उर्जा वस्तुओं का एक गुण है जो अन्य वस्तुओं में स्थानांतरित किया जा सकता है। किसी भी कर्ता के कार्य करने की क्षमता को उर्जा कहते हैं।

  उर्जा वस्तुओं और व्यक्तियों का स्वभाव है।  इसे देखा नहीं जा सकता महसूस किया जा सकता है।  वस्तुएं या द्रव्य स्वत: कार्य करती हैं या बाहरी बल से कार्य करती हैं। तब उनके अंदर ऊर्जा उत्पन्न होती है। वही उनके स्वरूप विस्थापन और प्रकृति परिवर्तन के लिए जिम्मेदार होती है।

         इसी प्रकार व्यक्ति के हर कार्य से ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो कभी समाप्त नहीं हो सकती। उसका परिणाम आना तय है ।तुरंत मिलेगा या फिर कई वर्षों के बाद ।भारतीय दर्शन इसे दूसरे जन्म में भी ले जाने की बात कहता है । हमारे कर्मों की ऊर्जा का ही प्रभाव ही है कि आज हम इस स्वरुप में है।यह भी महत्वपूर्ण है कि हम इस ऊर्जा के प्रवाह का प्रयोग किस प्रकार कर रहे हैं। क्योंकि कर्म से  ऊर्जा उत्पन्न होती है तो वहीं यह ऊर्जा का प्रवाह पुनः हमें कर्म करने के लिए बाध्य भी करता है।

            मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि' मनुष्य का एक हिस्सा ऐसा होता है जो क्षणिक  प्रशंसा से सफलता की ओर आकर्षित होता है'। वह सफलता के लिए उत्सुक होने लगता है।सफल होने के लिए किसी भी दिशा में जाने लगता है। यहीं से वह भटकाव के मार्ग का चयन कर लेता है। 

            यदि हम संतुलित होकर किसी की सफलता का विश्लेषण करते हैं। तो हमें समझ आता है कि सफलता कोई क्षणिक प्रवाह नहीं है।यह तो कई वर्षों या यों कहें की कई  जन्मों का प्रवाह है। यदि हम सफल व्यक्ति के सफलता के पीछे के मार्ग का अवलोकन करते हैं। तो पता चलता है कि यह उतना आसान नहीं होता।आप सफल व्यक्ति की सफलता को मत देखिए। उसे सफलता कैसे प्राप्त हुई ?उस मार्ग का विश्लेषण करें ।जब आप किसी के संघर्ष की कद्र करते हैं तो यह आपके कर्मों को भी एक दिशा दे देगा। मोहनदास करमचंद गांधी का महात्मा बनने का सफर उतना आसान नहीं था। दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों द्वारा अपमान के कई घूंट पीये थे। अपने सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह के सिद्धांतों का पालन जिस तन्मयता तथा उत्साह से किया वह आज कोई नहीं कर सकता।

        उसी प्रकार हमारे विचारों से भी ऊर्जा उत्पन्न होती है ।वह भी हमारे शरीर पर नकारात्मक तथा सकारात्मक प्रभाव डालती है।

      बुरे या अच्छे विचार पून:हम तक टकराते हैं उसी उर्जा के बंडल को लेकर आते हैं। जिस प्रकार प्रकाश की अपनी गति है ,उसी प्रकार विचारों में भी उर्जा है। इसकी अपनी  गति है। जिस प्रकार के विचार आप ब्राह्माण्ड में प्रसारित करेंगे यह ब्रह्माण्ड भी उसी के अनुरूप बनेगा यह मानना अल्बर्ट आइंस्टीन का है। इनके ‌अनुसार-'यह संसार जो बना है वह हमारी सोच का परिणाम है और यह तब तक नहीं बदल सकता जब तक कि सोच नहीं बदलती।'

        इसी  प्रकार  दुसरो के विचार भी हम तक टकराते है और उनका भी प्रभाव हम पर पड़ता है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति ने यदि आपको गाली दी है। यदि आप इसका प्रतिउत्तर आप गाली या अफशब्द भाषा का प्रयोग कर दे रहे हैं। तो इसका मतलब वह व्यक्ति आपके मस्तिष्क पर प्रभाव जमा रहा है। अत्यधिक अपशब्द कहता है और आपको गुस्से से ओतप्रोत कर देता है ।इसका मतलब उसके नकारात्मक विचार आपको प्रभावित कर रहे हैं।किसी की बातों का प्रभाव आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। परंतु हमारे अंदर बुद्धि ऐसी वस्तु है जो आपको पुन: नियंत्रित करने के लिए अच्छे -बुरे ,धर्म -धर्म ,नैतिक -अनैतिक के मध्य भेद करवाने लगती है ।

           यह प्रभाव क्षणिक है या फिर स्थाई है। यह जानना भी आवश्यक है।यदि आपको लगता है कि यह पुन:गालियों का प्रतिउत्तर देना मूर्खता है तो आप उसके प्रभाव से मुक्त हैं । यदि : 

        १)-आप प्रतिउत्तर देते हैं तो आप मान लीजिए आपके मस्तिष्क को नियंत्रित करने की दिशा में एक कदम बढ़ा दिया है।

      २) यदि गुस्से या उत्पन्न क्रोध का अपने प्रतिउत्तर तो नहीं दिया। परन्तु इसने आपके अंदर कितना प्रवेश किया है। यह जानना भी आवश्यक है।यदि आपको बैचेनी या चिन्ता हुई। इसका मतलब इसने आपके अंदर अपना डेरा डाला है।

     ३)यह प्रतिक्रया (क्रोध की) मानसिक तथा शारीरिक  दो प्रकार से आपको प्रभावित करती है।शारीरिक रूप से आपके हृदय रूपी यंत्र को प्रभावित कर, कई घातक परिणामों को जन्म देती है। मानसिक गतिविधियों में यह प्रभाव आपके स्मृति को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगा ।अत्यधिक चिंता मानसिक रोगों जैसे अज्ञात भय, बेचैनी ,गलत आकलन ,भ्रम, स्मरण शक्ति की कमजोरी ,अत्यधिक विचारों के प्रवाह को मस्तिष्क में  बढ़ाता है। परिणामत: एकाग्रता की भी कमी आने लगेगी ।उसका परिणाम दूसरे रूप में यह भी आएगा कि  आपको काम करना उबाऊ लगने लगेगा।

     ४)यदि आप कार्य के प्रति बोरियत महसूस कर रहे हैं ।इसका मतलब है- ईश्वर द्वारा प्रदत्त समय के महत्व से अनजान होकर मानव होने के महत्व की भूमिका से दूर हो गए ।

     ५)बोरियत महसूस करने का दूसरा परिणाम यह भी आ सकता है कि आपको यह अकर्मण्यता की और प्रवृत करें । अकर्मण्यता या कर्महिनता से तात्पर्य ऐसे कर्म जिसके परिणामों का तुरंत कोई फल नहीं है परंतु इस अकर्मण्यता से उत्पन्न ऊर्जा भी आपके पर्यावरण पर प्रभाव डालेगी और आपके साथ रहने वाले भी प्रभावित होंगे ।वो आप से या तो घृणा करने लगेंगे या फिर हेय दृष्टि से देखेंगे या फिर आप जैसे बनने लगेंगे विशेषकर बच्चे।

      इस प्रकार ऊर्जा चाहे स्वयं की हो या दूसरों की हो उसका प्रभाव खत्म नहीं होता ।ऊर्जा का स्वरूप कार्य से हो या विचारों से हो इसका प्रभाव आना तय है ।यदि हम संतुलित नहीं है तो यह ऊर्जा विध्वंस कारी हो सकती है। इसके परिणाम न केवल स्वयं पर वरन परिवार, तथा पर्यावरण पर भी आने तय है।

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