मोक्ष :एक अवस्था या अवधारणा

 

मोक्ष एक अवस्था या अवधारणा -



मोक्ष क्या है?

          लगभग सभी भारतीय दर्शन 'मोक्ष 'को परम लक्ष्य मानते हैं

  दर्शनों का मत

       केवल चार्वाक दर्शन को छोड़कर सभी दर्शनों ने मोक्ष सिद्धांत को स्वीकारा है।'मोक्ष'का सामान्य अर्थ दुख विनाश  होता है।मोक्ष एक ऐसी अवस्था है जिसमें सभी दुखों का नाश हो जाता है।

भारतीय दर्शन केवल मोक्ष की चर्चा कर मौन नहीं रहे बल्कि उस तक पहुंचने के लिए भी प्रयत्नशील रहते हैं।

        बोद्ध दर्शन में मोक्ष को 'निर्वाण' कहा गया है।निर्वाण का अर्थ बुझ जाना है। परंतु बौद्ध दर्शन में निर्वाण का अर्थ समस्त दुखों के अंत के रूप में लिया गया है। इसके बाद पूनरजन्म की श्रृंखला समाप्त हो जाती है। इस अवस्था की प्राप्ति के बाद भी जीवन बना रहता है।

      जैन दर्शन में भी 'मोक्ष' को जीवन का चरम लक्ष्य कहा गया है।मोक्षावस्था में आत्मा पून: अनन्त ज्ञान,अनन्त शक्ति, अनन्त दर्शन और अनन्त आनन्द को प्राप्त होता है।

     न्याय तथा वैशेषिक दर्शन ने मोक्ष को उच्छेद की अवस्था कहा है।मोक्ष की अवस्था में आत्मा का शरिर से वियोग होता है।

      सांख्य दर्शन के अनुसार मोक्ष तीन प्रकार के दुखों से छुटकारा पाना है। मोक्ष की अनुभूति तभी होती है,जब पुरुष स्वयं को प्रकृति से भिन्न समझने लगता है।मोक्ष की अवस्था में आत्मा को आनन्द की अनुभूति नहीं होती है।वह मुक्त हो जाता है।इस अवस्था को प्राप्त होने के बाद भी पूर्व जन्मों के प्रभाव वश शरीर विद्यमान रहता है।

       मीमांसा दर्शन में मोक्ष की अवस्था में आत्मा सभी विशेष गुणों से रहित हो जाती है।मोक्ष को अचेतन अवस्था कहा गया है क्योंकि मोक्ष में आत्मा अपने स्वाभाविकी अवस्था को प्राप्त होती है जो अचेतन है।इस अवस्था में आत्मा में ज्ञान का अभाव रहता है।

       अद्वैतवाद में मोक्ष का अर्थ आत्मा का ब्रह्म में विलीन हो जाना है। आत्मा वस्तुत: ब्रह्म है। शंकराचार्य ने मोक्ष को आनन्द की अवस्था कहा है।

      स्पष्टत: व्यक्ति दुख, क्लेश और पीड़ाओं से स्वयं को घीरा पाता है। प्रति क्षण सुख की चाह में भटकता है।यह भटकाव अनन्त है।पर दर्शन एसी अवस्था की ओर ध्यान आकृष्ट कराते हैं, जहां आनन्द ही आनन्द है।यह अवस्था हमारे समस्त दुखों का नाश कर देगी।


       आधुनिक युग में मोक्ष की प्रासंगिकता

         मोक्ष के शास्त्रिय मतों को समझने के बाद यह स्पष्ट होता है कि मोक्ष परम लक्ष्य है । इसके ऊपर कोई अवस्था है ही नहीं।  एक सामान्य व्यक्ति पद , प्रतिष्ठा , धन और भोग को लक्ष्य बनाकर इनके पिछे भागता रहता है। परिणाम में केवल दुख ही मिलते हैं। क्योंकि भौतिक सुखों की ऊपरी सीमा है ही नहीं। कहलु के बैल की तरह इनके पिछे भागता रहता है।

       भगवान बुद्ध ने संसार को दुखमय कहा है। दुखों को दुर करने के लिए भगवान बुद्ध ने अनुभवों तथा कठिन तप से कुछ उपाय दिए जो चार आर्य सत्य के नाम से जाने जाते हैं। भगवान बुद्ध के उपदेशों में व्यक्ति की मनोदशा, व्यथा के दूर करने पर केन्द्रिकरण  दिख पड़ता है। सबसे ज्यादा जोर मन में उत्पन्न भ्रम( अविद्या) को बताया जो दुखों का कारण है।इस प्रकार बोद्ध दर्शन में मनोविज्ञान का भी उल्लेख मिलता है।

      पद ,प्रतिष्ठा,धन और भोग को लक्ष्य बनाकर जीवन जीते तो केवल दुख को ही प्राप्त होना है। परन्तु इससे परे यदि हम आनन्द को लक्ष्य बनाते है तो वह सुखी रहना ही है। व्यक्ति निन्यानवे (99) के फेर से बचें रहता है।यह आनंद ही मोक्ष है। दर्शनों में इसे इसी जीवन में प्राप्त करने को कहा है। व्यक्ति दिन में कुछ पलों के लिए ही सही, सत्य के करिब होता है।भले क्षणिक ही सही वह उस सत्य को देख सकने में सक्षम होता है। आत्मा के रूप में जब देखने लगता है तब उसके कष्ट सहने की क्षमताएं बढ़ जाती है। अनावश्यक लक्ष्यों के पिछे भागने से बचाव करता है।पर यह भी उतना ही सत्य है कि एक सांसारिक व्यक्ति को ग्रहस्ती चलाने के लिए उपक्रम तो करने पड़ते हैं। लक्ष्य को निर्धारित करने की क्षमताएं कमजोर होने से केवल धन,पद,भोग को ही अपना लक्ष्य बनाता है।ऐसे में जीवन का आनंद क्या है ? उसे भूल जाता हैं। दर्शन इन लक्ष्यों से परे एक अन्य लक्ष्य प्रदान करता हैं परम आनंद का। इसलिए पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन कर विद्या अभ्यास उसके बाद पच्चीस वर्ष ग्रहस्ताश्रम में प्रवेश करता, उसके बाद पच्चीस वर्ष वह वन में रहता। बाद के पच्चीस वर्ष में संन्यास ग्रहण करने की यह आश्रम व्यवस्था बड़ी वैज्ञानिक है। जंगल में रहकर स्वयं को जानने , प्रकृति के मध्य व्यतीत करता व्यक्ति परम तत्व की ओर बढ़ता है।आश्रम व्यवस्था कर्तव्य निर्वहन के साथ स्वयं को जानने की एक उपयुक्त व्यवस्था है।यह व्यवस्था जीवन को समग्रता प्रदान करती है।

            पद, प्रतिष्ठा और धन को लक्ष्य मानने से व्यक्ति चक्री तरह एक के बाद एक लक्ष्य का निर्धारण करता है और उसको प्राप्त करता है। इन्हें पाना बुरा नहीं है। केवल इसी में अंतिम लक्ष्य को देखना बुरा है। इसलिए भारतीय दर्शन को मोक्ष जैसे परम लक्ष्य की आवश्यकता महसूस हुई। यह लक्ष्य जीवन को बंधने नहीं देता। भौतिक लक्ष्यों के अलावा एक अन्य दृष्टिकोण देता है। भागने की कोहलू के बैल की प्रक्रिया से मुक्ति देकर स्वयं के अस्तित्व को खोजने के लिए आकर्षित करता है।जो आपके पास है और जो नहीं है उनके मध्य कैसे संतोष पाया जाय।

            मोक्ष कोई पद नहीं है यह तो एक अनुभूति है जो स्वयं के शुद्ध, पवित्र, सात्विक होने पर अपने आप महसूस होती है।यह वह भाव है जो यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि मृत्यु परम सत्य है,मानव योनि महत्वपूर्ण है।मानव जीवन कई उत्तम कर्मों का फल है।इसे ओर कैसे सर्वोत्तम बना सकें। किसी वस्तु के पाने के प्रयास के पश्चात उसे न प्राप्त कर पाना दुविधा उत्पन्न करता है।यह उस दुविधा से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। जीवन को संतुलन देने के लिए, अनावश्यक भागदौड़ से दूर एक संतोष तथा नैतिकता से परिपूर्ण जीवन देता है। 

Comments

  1. Very nice 👌🏻

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  2. मुक्ति अनुभूति है I शब्दों में बाँधना कठिन है I सतत अभ्यास की आवश्यकता है I मेरे जैसे व्यक्ति के लिए कमेन्ट करना धृष्टता के अतिरिक्त कुछ नहीं है I अशुद्धियां

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  3. अधिक प्रभावी हो रही हैं I सादर l

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  4. It's still a mysterious subject n every explanation is insufficient and inadequate ...... one has to work out his or her own salvation....

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